अपने प्राचीन काल के गर्व के कारण हम अपने भूत के स्नेह में कड़ाई के साथ बँध जाते हैं और इससे हमें उत्तेजना मिलती है कि अपने पूर्वजों की धार्मिक बातों को आँख मूँदकर मानने के लिए तैयार हो जाएं। बारूद और उड़नखटोला में तो झूठ-साँच पकड़ने की गुंजाइश है, लेकिन धार्मिक क्षेत्र में तो अँधेरे में काली बिल्ली देखने के लिए हरेक आदमी स्वतंत्र है। न यहाँ सोलहों आना बत्तीसों रत्ती ठीक-ठीक तोलने के लिए कोई तुला है और न झूठ-साँच की कोई पक्की कसौटी।
-राहुल सांकृत्यायन
12 नवंबर को बड़हिया गया था, ऐसे तो सैकड़ों बार बड़हिया से गुजरा हूँ पर कभी महारानी स्थान नहीं गया था (माँ बाला त्रिपुरसुंदरी मंदिर) हाँ एक बार बचपन में और दूसरी बार शादी के अगले ही दिन ससुराल वालों और पत्नी के साथ गौर (प्रणाम) लगने वहाँ गए थे। इसलिए मंदिर को कभी पास से जान नहीं पाये खैर इस बार पहली बार सिर्फ और सिर्फ महारानी स्थान में पूजा करने और मंदिर को पास से जानने बड़हिया गए थे। बड़हिया स्टेशन पर से गांव को देखिये तो साफ़ साफ लगता है कि एक उजरा गुलिस्तान आँखों के सामने है। स्टेशन से मंदिर तक पैदल जाते हुए काफी कुछ दिखा कई लोगों से बात भी हुयी लेकिन सबने एक बात कही गौरवशाली इतिहास खुद को समृद्ध नहीं कर पाया। हमारा गांव गलत दिशा में भटक गया और बाद में राजनीती ने इस क्षेत्र के साथ ऐसा खेल खेला कि हम सिर्फ और सिर्फ पिछड़ते चले गए। हाँ एक पहचान वाले मिले जो यह मानने को तैयार नहीं कि बड़हिया किसी भी मामले में पीछे है। अपराध और राजनीतीक पकड़ कि कमजोरी किसी सम्पन्न गांव को कैसे दशकों पीछे धकेल देती है इसके लिए बड़हिया से बढ़िया कोई उदाहरण नहीं होगा। सैकड़ों बीघा के कई जोतदार लेकिन न कोई कृषि आधारित उद्योग या न ही रोजगार के लिए उपयुक्त स्थल। एक सज्ज्न मिले बोले बेटा मात्र दो दशक में यहाँ सब कुछ समाप्त हो गया और लक्खीसराय कहाँ से कहाँ पहुँच गया।
खैर बात माँ बाला त्रिपुरसुंदरी मंदिर कि बीच गांव में छोटे से परिसर में काफी भव्य रूप में बना एक आकर्षक मंदिर लेकिन पता नहीं क्यूँ मैं मंदिर में पूजा के बाद कुछ देर समय बिताने /लोगो से बात करने के बाद मुझे ऊपर राहुल सांकृत्यान कि बातें मंदिर कि मान्यता पर ज्यादा सटीक लगीं। चुकी मंदिर गांव के बीचोबीच है तो चहल पहल ज्यादा है बाकी फिर से वहाँ जाऊं ऐसा आकर्षण मैं नहीं समझता। (वैसे मेरे बड़हिया वाले मित्रगण इसे अन्यथा नहीं लेंगे)
महारानी मंदिर में पुरुषों कि अपेक्षा महिलाओं कि भीड़ ज्यादा रहती है सबको देवी से कुछ न कुछ चाहिए। किसी को बढ़िया पति, किसी को बेटा, किसी को बच्चा, किसी को किसी के लिए नौकरी, किसी को रोग से मुक्ति और अविवाहित युवकों को सुंदर बीबी भी चाहिए बताइये भला कितनो कि मुराद रोज पूरी करें माता ? मंदिर में चांदी के दरवाजे से लेकर पीने के पानी तक कि अच्छी व्यवस्था है। बाहर आये तो देखे तीन चार आदमी के साथ में पाठा था सुनने में आया बलि दी जायेगी। समय नहीं था इसलिए इस विषय पर किसी से पूछ नहीं पाये पर मन में यह सवाल कचोट रहा है कि क्या सच में बलि देने से कोई प्रसन्न हो हमारी मनोकामना पूर्ण कर देंगे।
अब भला बड़हिया जाइये और रसगुल्ला नहीं खाइये ऐसा होगा क्या उसमे भी हमारे एक मित्र ने कहा था जरुर खा कर बताइयेगा कि कैसा स्वाद है तो मित्र जी मुझे मजा नहीं आया रसगुल्ला खाने में।
शाम में मोकामा में एक होम्योपेथिक डॉक्टर साहब हमारे मित्र हैं उनके यहाँ बैठे तो फिर से महारानी स्थान कि कहानी शुरू। मैंने बताया कि मुझे कुछ मजा नहीं आया तो उन्होंने अपनी आप बीती बतायी। बोले कि एक बार मैं महारानी स्थान गया था। उस दिन मेरे सामने एक लड़का मंदिर में लाया गया जिसे सांप ने डंस लिया था। मंदिर में लोगों ने कहा कि यहाँ सांप डंसने के बाद अगर कोई जीवित आ जाये तो जीवित ही बाहर जाता है। उसके बाद उस लड़के पर कोई दो घंटे तक वहाँ भगत ने खूब पानी डलवाया और अपने स्तर से झाड़ फुक करते रहा लेकिन वह लड़का मर गया। दृश्य देखकर मन विचलित हो गया। मैंने लोगों से पूछा कि आप लोग तो बोल रहे थे कि जो यहाँ जिन्दा आता है जिन्दा ही जता है फिर यह मर कैसे गया ? मेरी बात सुनकर भगत गुस्से में मुझसे बोला ज्यादा होशियार मत बनो जरुर इस लड़के को यहाँ लाने के पहले किसी डॉक्टर या दूसरे जगह झड़ाने ले गया होगा। मैंने भी डांट कर बोल दिया जरुर या तो आपका झाड़ फुक गलत है या फिर तुम्हारी महारानी जी में कोई शक्ति नहीं है। शायद मेरी बातें वहाँ कई लोगो को चुभ गयी थी सब लोग मुझे गलत साबित करने में लग गए। किसी कि मौत को पहली बार मैंने लाइव देखी थी। उस दिन के बाद महारानी स्थान नहीं जाता हूँ।
उनकी बाते काफी मार्मिक थी। कई जगहों पर देखा जाता है कि लोग भूत प्रेत, सर्प दंस आदि में झाड़ फूक के चक्कर में पड़कर जान गवा देते हैं। धार्मिक स्थानों पर लोगों को जागरूक करने के लिए भी कोई उचित व्यवस्था होनी चाहिए।