बुधवार, 11 दिसंबर 2013

दानवीय चेहरा ही समलैंगिकता है

हम सबके अपने अपने शौक़ होते हैं...जिन्हें करने में एक अजीब तरह की मानसिक शान्ति मिलती है...एक सुकून, की ये मैंने ख़ुद के लिए किया है। लेकिन अपने शौक़ के साथ वक्त बिताने का मतलब यह कतई नहीं कि हम सही हैं और बाकि अन्य गलत या दूसरे हमसे रत्तीभर भी कम समझदार हैं या हम पूर्णरूप से गलत नहीं हैं 

हमें एक बार एक आदमी मिला था उसने बताया कि वह जिन्दा छिपकली को पकड़कर खा जाता है। सुनकर काफी आश्चर्य हुआ लेकिन थोड़े दिनों बाद ही उस आदमी को एक टीवी शो वही कारनामा दोहराते हुए देखकर और भी ज्यादा हैरत लेकिन एंकर ने कहा था तुम जो यह कर रहे हो यह मानव के भीतर का दानवीय चेहरा है। ईश्वर या कहूं कि प्रकृति के बनाये नियमों के विपरीत चलना है दानव होना है तो गलत नहीं होगा।

खैर, मुद्दे पर आते हैं... आज समलैंगिकता पर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो देश कि कई जानी मानी हस्तियां कह रही हैं कि अगर विदेशों में ऐसा सम्भव है तो यहाँ क्यों नहीं …… ऐसे दिवालियापन के शिकार लोगों पर कम शब्दों में कहें तो उनके भीतर का भी दानवीय चेहरा ही समलैंगिकता है तो गलत नहीं होगा ....

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मंडेला और समाज में रंगभेद

कौन सा साल था ठीक से याद नहीं है, शायद वर्ष 1992 या 93 का मार्च अप्रैल का महीना रहा होगा। उस दिन खेत से अनाज और भूसा आया था पांच - छह मजदूर थे जो सब अनाज और भूसा ट्रेक्टर से उतार कर घर में रख रहे थे। सब काम हो गया तो एक मजदूर ने मुझे बोला "बौआजी एगो बर्तन दिहो न पानी पीवे" पानी पीने के लिए उसने बर्तन माँगा और मैंने घर से एक लोटा लाकर उसकी ओर बढ़ा दिया। अभी उस मजदूर ने मेरे हाथ से लोटा लिया भी नहीं था कि उसके साथ आये अन्य एक मजदूर ने आगे बढ़कर मेरे हाथ से लोटा लगभग छीनने के अंदाज में ले लिया। लोटा लेने वाला मजदूर जाति से कहार था और लोटा मांगने वाला मुसहर या दुसाध जाति का था। उसके बाद उस कहार जाति वाले मजदूर ने दूसरे जाति वाले मजदूर को डांटते हुए कहा "आयं रे तो ई लोटवा में तों पहिले पानी पी लेमहि त छुआ न्य जैते , हमरा अर के पहिले पिए ले दे फिर तो पिहैं " (इस लोटा में अगर तुम पहले पानी पियोगे तो फिर हम सब इसमें पानी नहीं पी सकते हैं इसलिए पहले हम पानी पियेंगे फिर तुम पीना )

खैर बाद में घर में सब जाने कि उस लोटा को मैंने उस जाति वाले मजदूर को पानी पीने दिया था तो मुझे भी डांट लगी कि तुमको पूछ कर सामान देना चाहिए। उस दिन के बाद कई वर्षों तक वह लोटा घर के एक कोना में पड़ा रहा। उसमें कुछ जाति विशेष के लोगों को ही पानी पीने दिया जाता था।
उस दिन कि लोटा वाली घटना के बाद काफी दिनों तक इस विषय पर सोचता रहा फिर घर / परिवार / समाज ने जिनके साथ खाने पीने को बताया आज भी उन्ही के साथ खाने पीने कि कोशिश करता हूँ। जैसे जैसे उम्र बीत रहा है काफी कुछ परिवर्त्तन आ रहा है लेकिन आज भी कुछ लोगों कि चमड़ी देखने के बाद उनसे अलग रहना ही पसंद करता हूँ। साथ खाना पीना तो दूर कि बाद है।

कुछ वर्ष पूर्व शादी हुयी सबसे ज्यादा लोगों ने यही पूछा कि पत्नी कैसी है गोरी, काली या श्याम .... कई बार पांच सितारा होटल या बड़ी दुकानों से लेकर धार्मिक स्थलों (चाहे किसी भी धर्म का हो ) में गया हूँ तो वहाँ भी अगर कोई रंग का काला/ श्याम हो तो लोगों के चेहरे पर ही भेदभाव कि झलक दिखती है …

मतलब आज भी मेरे भीतर रंगभेद है या यूँ कहें कि समाज में रंगभेद है तो गलत नहीं होगा .... चमड़ी का रंग ही सारे रिश्तों को मजबूत करता है / चमड़ी का रंग ही कई जगहों पर अलग पहचान दिलाता है ……

और उन सबके बीच नेल्सन मंडेला से लेकर आज अम्बेडकर कि पुण्य तिथि पर आंसू बहाते लोगों को देखकर लगता है कि काश हम खुद को कुछ बदल लेते ....

काश किसी कि हत्या सिर्फ इसलिए नहीं होती कि उस युवक युवती ने अंतर्जातीय विवाह किया है ....

अफ्रीका कि धरती ने पहले बेरिस्टर गांधी को महात्मा बना दिया फिर शाही परिवार में जन्में मंडेला भी गाँधीवादी सिद्धांत पर चलते हुए महात्मा बन गए … दक्षिण अफ़्रिका की मिट्टी बड़ी खास मिटटी है .... नमन

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

सचिन के लिए भारत रत्न

सचिन के लिए भारत रत्न घोषित होने के बाद से लगातार ध्यानचंद जी के लिए भी लोग भारत रत्न कि मांग कर रहे हैं। बेशक ध्यानचंद जी अपने आप में ही भारत रत्न हैं इसलिए अगर राजनितिक कारणों से वे आज तक इस सममान से वंचित हैं तो इससे हॉकी और खेल जगत में भारत के लिए उनकी उपलब्धियां कम नहीं जाएँगी। लेकिन आज हॉकी जो नुमाइंदे ध्यानचंद के लिए चिल्ला रहे हैं काश वे हॉकी खेल को बढ़ावा देने और इसे भी क्रिकेट कि भांति लोकप्रिय बनाने के लिए कार्य करते तो सच में वह असली 'भारत रत्न' होता ध्यानचंद के लिए।

वैसे आज इंकलाबी शायर वामिक जौनपुरी कि पुण्यतिथि भी है। उनकी ही पंक्तिया हैं

'पूरब देश में डुग्गीबाजे, फैला सुख का काल।
जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल
रे साथी भूखा है बंगाल।'

वर्ष 1940 में जब बंगाल में भीषण सूखा पडा था तो उस समय उन्होंने 'भूखा बंगाल' कविता में ये पंक्तिया लिखी थी। संयोग से आज भी बंगाल के बड़े हिस्से पर ये पंक्तिया सटीक बैठती हैं।
एक और संयोग है कि ध्यानचंद का स्वर्णिम युग भी उसी 1940 के आसपास था और बंगाल कि भांति हॉकी भी आज कंगाल है।

पटना का विकास

13 नवम्बर को पटना गया था 8 साल के बाद वह भी पत्नी के साथ … बेंगलोर में पिछले साल जब BBMP शहर कि सफाई करने में नाकाम हो गयी थी तो मैंने भी खूब विरोध प्रदर्शन देखा और किया था … यहाँ पटना स्टेशन के बाहर आते ही पेशाव कि बदबू से सामना हुआ … तुरंत 1999 से 2004 के बीच पटना में रहने का यादगार पल स्मृति में ताजा हो गया … आगे बढ़े बोरिंग रोड जाने के टेम्पू चढ़ने गए तो वही कचरा के ऊपर लगा टेम्पू सब और नाक में रुमाल बांधे यात्री .... काला जूता कुछ मिनट में मटमैला हो गया था … बोरिंग रोड का रंग रूप भी पुराना वाला ही नजर आया … हा जब कुर्जी पहुचे तो पता चला कि एगो मॉल खुला है P & M मॉल … प्रकाश झा का बड़ा बड़ा चेहरा स्वागत करने के लिए तैयार था । बिग बाजार से लेकर पिज्जा और बर्गर सब कुछ एक छत के नीचे था लेकिन पटना में अभी मॉल कल्चर नहीं आया है .... स्वचालित सीढ़ि (एक्सलेटर ) पर चढ़ना आज भी लोगों के लिए पहाड़ चढ़ना है … वैसे कुर्जी में गंगा जी के पेट में बन रही बहुमंजली इमारतें … नियम कायदा कानून से अलग ही चेहरा प्रस्तुत कर रहा था … फिर से टेम्पू और इस बार कुर्जी से गांधी मैदान .... धुंआ पीते हुए रुक रुक कर चलती टेम्पू 30 मिनट में गांधी मैदान के पास थी … हमारा उजला टीशर्ट का एक बांह करछहुन हो गया था …… पूरा रास्ता में 8 साल पुराना वाला ही पटना दिखा .... और हाँ 2004 में जब अंतिम बार पटना गए थे तो उस दिन भी गोलघर में कुछ काम लगा था (शायद पेंटिंग का ) और इस बार भी वही दिखा … बांस घाट हो या राजेन्द्र बाबू समाधि स्थल लगा जैसा छोड़ कर गए थे 8 साल बाद सब कुछ वैसा ही है … गांधी मैदान पर पुस्तक मेला और शिक्षा प्रदर्शनी देखने के बाद निर्णय किये कि अब पैदल ही जक्शन जायेंगे .... विशाल मेगा मार्ट, श्री लेदर और तनिष्क घूमते खरीददारी करते एक बहुत बड़ा परिवर्त्तन दिखा जेल अब बुद्ध कि यादों को संजोने वाला स्थल बन गया है …

पत्नी बोली आयं जी ई वाला जे बुध स्मृति पार्क बनाया है एकरा से बढ़िया एजो टेम्पू स्टेंड बन जाता त जक्शन पर गंदगी, भीड़, ट्रेफिक सब खत्म हो जाता .... बेंगलोर में मैजेस्टिक बस स्टॉप जैसन …

अब पत्नी जी को कौन बताये कि सरकार के विकास का मानक चिन्ह है बुध स्मृति पार्क

किसान

क्रिकेट के लिए दीवाने देश में अगर ४ सीआरपीएफ जवान मर जाये या फिर कोई किसान विधान सभा के सामने जहर पीकर आत्महत्या करले और फिर भी खबर सुर्खी न पाये तो इससे बड़ी त्रासदी इस देश के लिए कुछ और नहीं होगी। आज छतीसगढ़ में जहाँ चार जवान एक बार फिर नक्सलवादी हमले के शिकार बने वहीं कर्नाटक के बेलगाम में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान गन्ना के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 2500 रूपये टन से बढाकर 3000 रुपये टन किये जाने को लेकर प्रदर्शन कर रहे एक किसान ने जहर पीकर आत्महत्या कर ली लेकिन इन ख़बरों में कोई मसाला नहीं है इसलिए सरकार से साथ साथ मीडिया भी आँखें मूंदे है।

देश में उद्योग और कार्पोरेट के लिए अगर रेड कार्पेट बिछाना हो तो उसका रास्ता किसान कि जमीन पर से हो कर गुजरता है और अगर वोट पाना हो तो उसके लिए किसान का अनाज रूपये दो रूपये किलो में बाँटने के लिए सरकार तैयार है लेकिन अगर बात उसी किसान जरूरतों को पूरा करने का हो तो सरकार के लिए यह वोट बैंक नहीं बन पता। कर्नाटक में जिंदगी से बेहतर मौत को गले लगाने वाले किसान ने इस वर्ष पट्टे पर 9 एकड़ जमीन लेकर गन्ने कि खेती कि थी लेकिन पूरी फसल बर्बाद हो गयी। ऊपर से गन्ना का समर्थन मूल्य भी मात्र 2500 रूपये है और चीनी मिल मालिक उससे उलट मात्र 2000 रूपये प्रति टन गन्ना खरीद रहे है। ऐसे हजारों किसान हैं जिन्होंने गन्ने कि खेती के लिए बैंक या साहूकार से कर्ज ले रखा है। पैसा नहीं देंगे तो भी मौत है और दे देते हैं तो पूरे साल परिवार का क्या होगा इसकी चिंता। दुर्भाग्य है कि इन किसानों तक केंद्र और राज्य कि कोई भी योजना उन्हें दो वक्त कि रोटी देने में असमर्थ है। किसानों कि दयनीय स्थिति और दोहन के लिए न तो कोई दल और न ही मानवाधिकार या सिविल सोसायटी आवाज उठाने के लिए आगे आएगी। ऐसे किसानों के समर्थन में हमने कहीं भी केंडल लेकर प्रदर्शन करने वाली भीड़ नहीं देखी है।
किसान नामक इस शब्द के साथ में राज्य का कोई नाम हो कर्नाटक /महाराष्ट्र /तमिलनाडु /मध्य प्रदेश या फिर बिहार /बंगाल … किसान कि स्थिति हर प्रान्त में एक जैसी ही है।

इस बिहार गए तो लखीसराय के पास एक गांव में स्थित एक मंदिर गए। मंदिर के बाहर कोई 100 छोटी बड़ी दुकानें थी। एक दुकान में पूजा कि सामग्री और प्रसाद खरीदने पहुचें तो दुकान वाले ने कुल जमा 32 रूपये माँगा। मैंने उसे दस रूपये के तीन नोट पकड़ा दिए … बाबूजी 2 रुपया और दीजिये .... मैंने उससे कहा 2 रुपया खुदरा नहीं है … दुकानकार - अरे खुदरा नहीं है तो ये पैसा लीजिये और जाइये दूसरा दुकान देखिये … उसके गुस्से को देखकर दो कदम पीछे हुए और कहा .... अरे भाई एतना गुस्सा होइएगा तो कैसे दुकानदारी कीजियेगा …
तो आपको क्या लग रहा है ई दुकान से हम ताजमहल बना लेंगे .... जैसे दू दिन से बोहनी नहीं हुआ एक और दिन सही क्या हो जायेगा जो आप परसादी नहीं लीजियेगा … दुकानदार के भीतर छुपे आक्रोश को जानने के लिए इस बार उसकी दुकान कि बेंच पर हम बैठ गए … आप इतना गुस्सा में काहे बात कर रहे हैं क्या हुआ बताइये तो सही ....
दुकानदार : नौकरी करते हैं न बौआ आप
जी
ई है कारन है किसान मजदूर के दर्द को आप नहीं जानते हैं। नौ बीघा में गहूंम लगाये थे। बाजार का बीया था पूरा फसल बाली आवे तक बढ़िया दिखा अ गहुम हुआ 100 मन .... kCC के रखे से बैंक का डर अलग .... बेटा के दिल्ली में BCA में नाम लिखाये थे ओकरो अबरी साल फ़ीस नै भराया त ऐजे बइठल है .... तीन गो जुआन बेटी बियाहे ले है …… आ आप कहते हैं कि दू रुपया में कि हो जायेगा … ई दोकान जे देख रहे हैं एजो खली सोमार के भीड़ रहता है .... इ से लाख दू लाख नय कमाते हैं हम … बस दिन कट्टन है …
उनकी बातों का कोई जबाब नहीं था मेरे पास क्युकी किसान परिवार में पैदा होने के कारण बड़े ही करीब से किसानों के दर्द से वाकिफ हूँ … थोड़ी देर कुछ और भी बातें हुयी .... बेंच पर से उठे तो दुकानकार का गुस्सा मेरे लिए कम हो गया था .... स्नेह भरी आवाज में बोला जाइये बौआ जी पूजा करके आ जाइये EMU आने का समय हो गया है फेरो भीड़ बढ़ जायेगा .... जेब से निकालकर पांच का सिक्का बढ़ाया तो बोले रख लीजिये इसे अब आप से नहीं लेंगे ....

सरकार नीतियॉ चाहे उद्योग के लिए बने या बिल्ड़र के लिए अस्पताल बने या अजायबघर हर जगह जमीन चाहिए किसान कि .... और अगर वोट चाहिए तो वहाँ भी किसान का अनाज लकिन किसान को क्या चाहिए यह प्रश्न हर राज्य और केंद्र सरकार के अनुत्तरित है

माँ बाला त्रिपुरसुंदरी मंदिर, बड़हिया

अपने प्राचीन काल के गर्व के कारण हम अपने भूत के स्‍नेह में कड़ाई के साथ बँध जाते हैं और इससे हमें उत्‍तेजना मिलती है कि अपने पूर्वजों की धार्मिक बातों को आँख मूँदकर मानने के लिए तैयार हो जाएं। बारूद और उड़नखटोला में तो झूठ-साँच पकड़ने की गुंजाइश है, लेकिन धार्मिक क्षेत्र में तो अँधेरे में काली बिल्‍ली देखने के लिए हरेक आदमी स्‍वतंत्र है। न यहाँ सोलहों आना बत्‍तीसों रत्‍ती ठीक-ठीक तोलने के लिए कोई तुला है और न झूठ-साँच की कोई पक्‍की कसौटी।
-राहुल सांकृत्‍यायन

12 नवंबर को बड़हिया गया था, ऐसे तो सैकड़ों बार बड़हिया से गुजरा हूँ पर कभी महारानी स्थान नहीं गया था (माँ बाला त्रिपुरसुंदरी मंदिर) हाँ एक बार बचपन में और दूसरी बार शादी के अगले ही दिन ससुराल वालों और पत्नी के साथ गौर (प्रणाम) लगने वहाँ गए थे। इसलिए मंदिर को कभी पास से जान नहीं पाये खैर इस बार पहली बार सिर्फ और सिर्फ महारानी स्थान में पूजा करने और मंदिर को पास से जानने बड़हिया गए थे। बड़हिया स्टेशन पर से गांव को देखिये तो साफ़ साफ लगता है कि एक उजरा गुलिस्तान आँखों के सामने है। स्टेशन से मंदिर तक पैदल जाते हुए काफी कुछ दिखा कई लोगों से बात भी हुयी लेकिन सबने एक बात कही गौरवशाली इतिहास खुद को समृद्ध नहीं कर पाया। हमारा गांव गलत दिशा में भटक गया और बाद में राजनीती ने इस क्षेत्र के साथ ऐसा खेल खेला कि हम सिर्फ और सिर्फ पिछड़ते चले गए। हाँ एक पहचान वाले मिले जो यह मानने को तैयार नहीं कि बड़हिया किसी भी मामले में पीछे है। अपराध और राजनीतीक पकड़ कि कमजोरी किसी सम्पन्न गांव को कैसे दशकों पीछे धकेल देती है इसके लिए बड़हिया से बढ़िया कोई उदाहरण नहीं होगा। सैकड़ों बीघा के कई जोतदार लेकिन न कोई कृषि आधारित उद्योग या न ही रोजगार के लिए उपयुक्त स्थल। एक सज्ज्न मिले बोले बेटा मात्र दो दशक में यहाँ सब कुछ समाप्त हो गया और लक्खीसराय कहाँ से कहाँ पहुँच गया। 
खैर बात माँ बाला त्रिपुरसुंदरी मंदिर कि बीच गांव में छोटे से परिसर में काफी भव्य रूप में बना एक आकर्षक मंदिर लेकिन पता नहीं क्यूँ मैं मंदिर में पूजा के बाद कुछ देर समय बिताने /लोगो से बात करने के बाद मुझे ऊपर राहुल सांकृत्यान कि बातें मंदिर कि मान्यता पर ज्यादा सटीक लगीं। चुकी मंदिर गांव के बीचोबीच है तो चहल पहल ज्यादा है बाकी फिर से वहाँ जाऊं ऐसा आकर्षण मैं नहीं समझता। (वैसे मेरे बड़हिया वाले मित्रगण इसे अन्यथा नहीं लेंगे) 
महारानी मंदिर में पुरुषों कि अपेक्षा महिलाओं कि भीड़ ज्यादा रहती है सबको देवी से कुछ न कुछ चाहिए। किसी को बढ़िया पति, किसी को बेटा, किसी को बच्चा, किसी को किसी के लिए नौकरी, किसी को रोग से मुक्ति और अविवाहित युवकों को सुंदर बीबी भी चाहिए बताइये भला कितनो कि मुराद रोज पूरी करें माता ? मंदिर में चांदी के दरवाजे से लेकर पीने के पानी तक कि अच्छी व्यवस्था है। बाहर आये तो देखे तीन चार आदमी के साथ में पाठा था सुनने में आया बलि दी जायेगी। समय नहीं था इसलिए इस विषय पर किसी से पूछ नहीं पाये पर मन में यह सवाल कचोट रहा है कि क्या सच में बलि देने से कोई प्रसन्न हो हमारी मनोकामना पूर्ण कर देंगे। 
अब भला बड़हिया जाइये और रसगुल्ला नहीं खाइये ऐसा होगा क्या उसमे भी हमारे एक मित्र ने कहा था जरुर खा कर बताइयेगा कि कैसा स्वाद है तो मित्र जी मुझे मजा नहीं आया रसगुल्ला खाने में। 

शाम में मोकामा में एक होम्योपेथिक डॉक्टर साहब हमारे मित्र हैं उनके यहाँ बैठे तो फिर से महारानी स्थान कि कहानी शुरू। मैंने बताया कि मुझे कुछ मजा नहीं आया तो उन्होंने अपनी आप बीती बतायी। बोले कि एक बार मैं महारानी स्थान गया था। उस दिन मेरे सामने एक लड़का मंदिर में लाया गया जिसे सांप ने डंस लिया था। मंदिर में लोगों ने कहा कि यहाँ सांप डंसने के बाद अगर कोई जीवित आ जाये तो जीवित ही बाहर जाता है। उसके बाद उस लड़के पर कोई दो घंटे तक वहाँ भगत ने खूब पानी डलवाया और अपने स्तर से झाड़ फुक करते रहा लेकिन वह लड़का मर गया। दृश्य देखकर मन विचलित हो गया। मैंने लोगों से पूछा कि आप लोग तो बोल रहे थे कि जो यहाँ जिन्दा आता है जिन्दा ही जता है फिर यह मर कैसे गया ? मेरी बात सुनकर भगत गुस्से में मुझसे बोला ज्यादा होशियार मत बनो जरुर इस लड़के को यहाँ लाने के पहले किसी डॉक्टर या दूसरे जगह झड़ाने ले गया होगा। मैंने भी डांट कर बोल दिया जरुर या तो आपका झाड़ फुक गलत है या फिर तुम्हारी महारानी जी में कोई शक्ति नहीं है। शायद मेरी बातें वहाँ कई लोगो को चुभ गयी थी सब लोग मुझे गलत साबित करने में लग गए। किसी कि मौत को पहली बार मैंने लाइव देखी थी। उस दिन के बाद महारानी स्थान नहीं जाता हूँ। 

उनकी बाते काफी मार्मिक थी। कई जगहों पर देखा जाता है कि लोग भूत प्रेत, सर्प दंस आदि में झाड़ फूक के चक्कर में पड़कर जान गवा देते हैं। धार्मिक स्थानों पर लोगों को जागरूक करने के लिए भी कोई उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

नया नवेला सा हो जाता है हमारा प्यार

आज फिर मुझसे पूछती है बार बार 
कितने दिनों से तुमने पूछा ही नहीं 
मेरा हाल ?

अब तो याद भी नहीं
कब रूठी थी मैं 
और कब मनाया था तुमने बार-बार ?

अरसा गुजर गया,
जब मिलती थी मैं 
तो बाहें पसारे खड़े होते थे तुम हर बार।

बुझे मन से कहती है
नजदीकियों ने ही कर दिया है
हमारे प्यार को शायद बेराह।

पर वह जानती है
जितनी बार बेसलीका हुआ है प्यार
फिर से नया नवेला सा हो जाता है हमारा प्यार ... 

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

हमारी बाँहों में सिमट जाएं

कुछ तुम मुझसे कहो 
कुछ हम तुम्हे सुनाएं!!
मिलकर हम तुम 
प्रीत के गीत गाए 

शर्म में झुकी हुयी 
तुम्हारी नजर 
और दिल में पास 
आने की तमन्ना 

मौन शब्दों के भाव 
फिर होठों पर आएं 
और शरमाकर आप 
हमारी बाँहों में सिमट जाएं.

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

प्रकृति में मौत

कभी देखे हो हमारे शहर को 
जहां इमारतें तो दिखती है 
पर आसमान नहीं दिखता 
तुम तारों की बात करते हो 
यहाँ तो सुबह रौशनी भी 
अब साफ साफ नहीं दिखती 
और शाम सूरज की लाली नहीं 
धुएं का गुबार लेकर आती है 

तुम भी आना मेरे शहर और देखना 
यहाँ की प्रकृति में मौत नजर आती है

जुगनू

रात भर चमका है जुगनू
बंद अँधेरे उस कमरे में 
रह रह कर किताबों की अलमारी पर
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
कभी खिड़की तो कभी रोशनदान पर 

देखता और सोचता रहा नींद के आगोश में 
कल सुबह पकड़ूँगा तुम्हे 
और संजो के रख लूँगा 
फिर एक बार शीशे के ज़ार में,
बिल्कुल बचपन की तरह ....

टेढ़ी -मेढ़ी यह जिन्दगी

हर दिन दौड़ी हौले -हौले टेढ़ी -मेढ़ी यह जिन्दगी 
खुद से दूर खड़ा कर पूछे किस्से कई यह जिन्दगी 

कब छूटा था तेरा बचपन,
अहसास हुआ कब यौवन का 
बता मुझे कब गलिया छोड़ी 
जिसमे यादे बसती है 

खेल-खिलौने, रिश्ते-नाते, 
स्नेह-प्रेम सब क्यों खोया 
यादों के इस गुलशन में तूने
क्या-क्या और कहा खोया

हर दिन खोते इस जीवन में
कहाँ, कही कुछ पाया है
जीवन की इस रीत में एक दिन
सब कुछ यही तो खो जायेगा