शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मंडेला और समाज में रंगभेद

कौन सा साल था ठीक से याद नहीं है, शायद वर्ष 1992 या 93 का मार्च अप्रैल का महीना रहा होगा। उस दिन खेत से अनाज और भूसा आया था पांच - छह मजदूर थे जो सब अनाज और भूसा ट्रेक्टर से उतार कर घर में रख रहे थे। सब काम हो गया तो एक मजदूर ने मुझे बोला "बौआजी एगो बर्तन दिहो न पानी पीवे" पानी पीने के लिए उसने बर्तन माँगा और मैंने घर से एक लोटा लाकर उसकी ओर बढ़ा दिया। अभी उस मजदूर ने मेरे हाथ से लोटा लिया भी नहीं था कि उसके साथ आये अन्य एक मजदूर ने आगे बढ़कर मेरे हाथ से लोटा लगभग छीनने के अंदाज में ले लिया। लोटा लेने वाला मजदूर जाति से कहार था और लोटा मांगने वाला मुसहर या दुसाध जाति का था। उसके बाद उस कहार जाति वाले मजदूर ने दूसरे जाति वाले मजदूर को डांटते हुए कहा "आयं रे तो ई लोटवा में तों पहिले पानी पी लेमहि त छुआ न्य जैते , हमरा अर के पहिले पिए ले दे फिर तो पिहैं " (इस लोटा में अगर तुम पहले पानी पियोगे तो फिर हम सब इसमें पानी नहीं पी सकते हैं इसलिए पहले हम पानी पियेंगे फिर तुम पीना )

खैर बाद में घर में सब जाने कि उस लोटा को मैंने उस जाति वाले मजदूर को पानी पीने दिया था तो मुझे भी डांट लगी कि तुमको पूछ कर सामान देना चाहिए। उस दिन के बाद कई वर्षों तक वह लोटा घर के एक कोना में पड़ा रहा। उसमें कुछ जाति विशेष के लोगों को ही पानी पीने दिया जाता था।
उस दिन कि लोटा वाली घटना के बाद काफी दिनों तक इस विषय पर सोचता रहा फिर घर / परिवार / समाज ने जिनके साथ खाने पीने को बताया आज भी उन्ही के साथ खाने पीने कि कोशिश करता हूँ। जैसे जैसे उम्र बीत रहा है काफी कुछ परिवर्त्तन आ रहा है लेकिन आज भी कुछ लोगों कि चमड़ी देखने के बाद उनसे अलग रहना ही पसंद करता हूँ। साथ खाना पीना तो दूर कि बाद है।

कुछ वर्ष पूर्व शादी हुयी सबसे ज्यादा लोगों ने यही पूछा कि पत्नी कैसी है गोरी, काली या श्याम .... कई बार पांच सितारा होटल या बड़ी दुकानों से लेकर धार्मिक स्थलों (चाहे किसी भी धर्म का हो ) में गया हूँ तो वहाँ भी अगर कोई रंग का काला/ श्याम हो तो लोगों के चेहरे पर ही भेदभाव कि झलक दिखती है …

मतलब आज भी मेरे भीतर रंगभेद है या यूँ कहें कि समाज में रंगभेद है तो गलत नहीं होगा .... चमड़ी का रंग ही सारे रिश्तों को मजबूत करता है / चमड़ी का रंग ही कई जगहों पर अलग पहचान दिलाता है ……

और उन सबके बीच नेल्सन मंडेला से लेकर आज अम्बेडकर कि पुण्य तिथि पर आंसू बहाते लोगों को देखकर लगता है कि काश हम खुद को कुछ बदल लेते ....

काश किसी कि हत्या सिर्फ इसलिए नहीं होती कि उस युवक युवती ने अंतर्जातीय विवाह किया है ....

अफ्रीका कि धरती ने पहले बेरिस्टर गांधी को महात्मा बना दिया फिर शाही परिवार में जन्में मंडेला भी गाँधीवादी सिद्धांत पर चलते हुए महात्मा बन गए … दक्षिण अफ़्रिका की मिट्टी बड़ी खास मिटटी है .... नमन

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