मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

हमारी बाँहों में सिमट जाएं

कुछ तुम मुझसे कहो 
कुछ हम तुम्हे सुनाएं!!
मिलकर हम तुम 
प्रीत के गीत गाए 

शर्म में झुकी हुयी 
तुम्हारी नजर 
और दिल में पास 
आने की तमन्ना 

मौन शब्दों के भाव 
फिर होठों पर आएं 
और शरमाकर आप 
हमारी बाँहों में सिमट जाएं.

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

प्रकृति में मौत

कभी देखे हो हमारे शहर को 
जहां इमारतें तो दिखती है 
पर आसमान नहीं दिखता 
तुम तारों की बात करते हो 
यहाँ तो सुबह रौशनी भी 
अब साफ साफ नहीं दिखती 
और शाम सूरज की लाली नहीं 
धुएं का गुबार लेकर आती है 

तुम भी आना मेरे शहर और देखना 
यहाँ की प्रकृति में मौत नजर आती है

जुगनू

रात भर चमका है जुगनू
बंद अँधेरे उस कमरे में 
रह रह कर किताबों की अलमारी पर
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
कभी खिड़की तो कभी रोशनदान पर 

देखता और सोचता रहा नींद के आगोश में 
कल सुबह पकड़ूँगा तुम्हे 
और संजो के रख लूँगा 
फिर एक बार शीशे के ज़ार में,
बिल्कुल बचपन की तरह ....

टेढ़ी -मेढ़ी यह जिन्दगी

हर दिन दौड़ी हौले -हौले टेढ़ी -मेढ़ी यह जिन्दगी 
खुद से दूर खड़ा कर पूछे किस्से कई यह जिन्दगी 

कब छूटा था तेरा बचपन,
अहसास हुआ कब यौवन का 
बता मुझे कब गलिया छोड़ी 
जिसमे यादे बसती है 

खेल-खिलौने, रिश्ते-नाते, 
स्नेह-प्रेम सब क्यों खोया 
यादों के इस गुलशन में तूने
क्या-क्या और कहा खोया

हर दिन खोते इस जीवन में
कहाँ, कही कुछ पाया है
जीवन की इस रीत में एक दिन
सब कुछ यही तो खो जायेगा