रात भर चमका है जुगनू
बंद अँधेरे उस कमरे में
रह रह कर किताबों की अलमारी पर
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
कभी खिड़की तो कभी रोशनदान पर
देखता और सोचता रहा नींद के आगोश में
कल सुबह पकड़ूँगा तुम्हे
और संजो के रख लूँगा
फिर एक बार शीशे के ज़ार में,
बिल्कुल बचपन की तरह ....
बंद अँधेरे उस कमरे में
रह रह कर किताबों की अलमारी पर
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
कभी खिड़की तो कभी रोशनदान पर
देखता और सोचता रहा नींद के आगोश में
कल सुबह पकड़ूँगा तुम्हे
और संजो के रख लूँगा
फिर एक बार शीशे के ज़ार में,
बिल्कुल बचपन की तरह ....
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