मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

जुगनू

रात भर चमका है जुगनू
बंद अँधेरे उस कमरे में 
रह रह कर किताबों की अलमारी पर
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
कभी खिड़की तो कभी रोशनदान पर 

देखता और सोचता रहा नींद के आगोश में 
कल सुबह पकड़ूँगा तुम्हे 
और संजो के रख लूँगा 
फिर एक बार शीशे के ज़ार में,
बिल्कुल बचपन की तरह ....

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