मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

सचिन के लिए भारत रत्न

सचिन के लिए भारत रत्न घोषित होने के बाद से लगातार ध्यानचंद जी के लिए भी लोग भारत रत्न कि मांग कर रहे हैं। बेशक ध्यानचंद जी अपने आप में ही भारत रत्न हैं इसलिए अगर राजनितिक कारणों से वे आज तक इस सममान से वंचित हैं तो इससे हॉकी और खेल जगत में भारत के लिए उनकी उपलब्धियां कम नहीं जाएँगी। लेकिन आज हॉकी जो नुमाइंदे ध्यानचंद के लिए चिल्ला रहे हैं काश वे हॉकी खेल को बढ़ावा देने और इसे भी क्रिकेट कि भांति लोकप्रिय बनाने के लिए कार्य करते तो सच में वह असली 'भारत रत्न' होता ध्यानचंद के लिए।

वैसे आज इंकलाबी शायर वामिक जौनपुरी कि पुण्यतिथि भी है। उनकी ही पंक्तिया हैं

'पूरब देश में डुग्गीबाजे, फैला सुख का काल।
जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल
रे साथी भूखा है बंगाल।'

वर्ष 1940 में जब बंगाल में भीषण सूखा पडा था तो उस समय उन्होंने 'भूखा बंगाल' कविता में ये पंक्तिया लिखी थी। संयोग से आज भी बंगाल के बड़े हिस्से पर ये पंक्तिया सटीक बैठती हैं।
एक और संयोग है कि ध्यानचंद का स्वर्णिम युग भी उसी 1940 के आसपास था और बंगाल कि भांति हॉकी भी आज कंगाल है।

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