शुक्रवार, 3 जून 2011

लगन (विवाह समारोह)

मोकामा की फिज़ाओ में इस बार लगन (विवाह समारोहों ) की धूम थी. मेरे घर में ही 12  से 26  मई के बीच कुल 12  निमंत्रण मौजूद थे. तीन  मौखिक आमन्त्रण भी थे. 
विवाह को वैसे तो हिन्दू  धार्मिक पद्धति में अति शुभ अवम मांगलिक तरीके से सम्पन्न कराया जाता है. जिसके तहत नव युगल जोड़े के जीवन की खुशियों एवम शुख - शांति की मंगल कामना हम अलग - अलग तरीके से अपने अपने ईस्ट से करते है. 
खैर बात मोकामा के विवाह समारोहों की करू तो कुछ चीजे नयी एवम आडम्बर तथा विलासिता की रंग में रंगा  पाया. यु तो विवाह समारोहों में साज - सज्जा, खान - पान आदि पे खर्च तो आम चलन है लकिन इसमें अगर विलासिता के रंग घुलने शुरू हो जाये तो ये भटकाव समाज को रसातल में ले जाने को काफी है. इसे पढ़ते हुए जरूरी नहीं आप मेरे विचारो से सहमत हो, लेकिन मेरे आँखों देखे इन कुछ विवाह समारोहों ने मुझे कई चीजो पर सोचने को मजबूर किया है.
मसलन शादी के नाम पर दहेज तो सबसे बड़ा कलंक है ही लेकिन इसके साथ ही जयादा तर परिवारों के द्वारा विवाह को सादगी पूर्ण रूप में सम्पन्न न करा के आडम्बर एवम दिखावे के रूप में सम्पन्न करना कई सामाजिक प्रश्नों को जन्म देता है. 
शादी समारोहों में तिलक एवम बारात में जाने के लिए छोटी गाडियों के बढ़ते चलन से जहा एक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है वही प्रदूसन एवम पेट्रोल - डीजल की खपत भी बढती है. कई परिवारों के लिए गाड़ी आदि का कम प्रश्न शान की बात में तब्दील हो जाता है. 
शादियों में बजने वाले बाजे (बेंड पार्टियों ) पर भी एक अनावश्यक खर्च के रूप में कई परिवारों को विवाह सम्पन्न होने के बाद भी लम्बे समय तक आर्थिक परेशानी पैदा किये रहता है. (खासकर लड़की पक्ष को) आज कल बेंड पार्टियों के साथ ही आर्केस्ट्रा का चलन भी बढता जा रहा है. 
पटाखे भी उसी दिखावे का एक हिस्सा है. 
लेकिन सबसे बड़ी चिंता है.......शराब ....जी हा शराब का प्रचलन विवाह समारोहों में इस कदर बढा है की ये हर शादी समारोह में लड़ाई -झगडे से लेकर पुरे शादी समारोह को ही ख़राब कर देता है. हमारे यहाँ के जो भी युवा है उनसे मेरा विनम्र आग्रह है...कृपया शराब से शादी के पवित्र समारोह को ख़राब न करे. 
लकिन इन सबके साथ ही भोजपुरी एवम हिंदी फ़िल्मी गीतों में अश्लीलता के रस घोल कर उसे अपने ही समाज और वहा की बहु - बेटियों के समक्ष गंदे एवम असलील तरीके से नाचने का दिखावा आज के समय में हमारे समाज की विचार शुन्यता का परिचायक है. 
सामजिक व्यवस्था में हर व्यक्ति एक जैसा हो ये समभ नहीं है. लेकिन मैंने ये बड़े ही पास से महसूस किया है की जयादा तर वो परिवार जो ऐसे आडम्बर पूर्ण आयोजनों के बाद कई वर्षो तक आर्थिक परेसानियो का सामना करते है उन्हें इन विषयों पर खास कर धयान देना चाहिए. 
इसके साथ समाज के हरेक परिवार को जागरूक होकर विवाह समारोहों में होने वाले ऐसे दिखावे roopi आयोजन से बचना चाहिए. 
खैर मोकामा और अन्य गावो में आज हमारी पौराणिक रीती रिवाज जीवित है...और ये विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्यो में दिख जाते है...सामाजिक सहयोग, महिलाओ के द्वारा लोक गीतों की प्रस्तुति (नचारी, कोहबर, पीहर, देवता के गीत, मजाक में गालियों का चलन आदि)  आदि विवाह समारोहों को खुशियों के रंगों में भी रंगता है.. 
इन शादी समारोहों में जम कर रसगुल्ले खाया. वैसे एक बारात में रात में 2  बाजे खाना नसीब हुआ.लगभग हर शादी समारोह में "पल पल न माने ये टिंकू जिया" गाने की धूम रही. 
पर सब मिला कर शादियों के मौसम में मोकामा में थोड़े दिन बिताना बड़ा ही आनंददायी रहा.

परशुराम यज्ञं

6 मई की शाम में घर (मोकामा) में था. फिर अपनों के प्रेम, स्नेह और आशीर्वाद का दौर शुरू. पूरे रस्ते और घर के आस - पास जो भी मिले सबो को प्रणाम करने का अनवरत सिलसिला..साथ ही कई स्नेही जानो से मुलाकात के बाद पूरे 71  दिनों बाद घर का खाना खा रहा था. बिजली देवता उस रात  मेहरवान थे इसलिए पूरी रात चैन से सोया. 
अगली सुबह परम आराध्य भगवान् परशुराम के दर्शन को गया...5  से  9  मई के बीच परशुराम यज्ञं होने के कारन वहा भीड़ कुछ जयादा ही थी. दर्शन, पूजा  उपरांत अपनी आदतों के तहत वहा की खामिया और खूबियों नजर दौराने लगा. 
मंदिर के विकाश के लिए परशुराम मंदिर विकास समिति के सदस्य बनने हेतु इच्छुक व्यक्ति अब 50  रूपये मासिक की दर सदस्यता शुल्क जमा कर वहा के सदस्य बन सकते है. मंदिर परिसर में विवाह, मुंडन, जनेऊ, पूजा व् अन्य मांगलिक कार्यो के लिए आप 11, 21, 51, 101 की शुल्क आदायगी कर वहा शुभ कार्य, गाड़ी पूजन आदि कर सकते है. 
मंदिर के भीतर इस बार रास्तो का पुनर्निर्माण किया गया है, पानी की नयी व्यवस्था की गयी है, भगवान् परशुराम की मूर्ति को शीसे के अन्दर ढँक दिया गया है. 
यज्ञं में प्रवचन करता विशेस आकर्षण करने में अक्षम दिखे. उनके पास ज्ञान तो था पर वाक् चपल नहीं थे. हा यज्ञं कुंड के चारो और फेरी देने वाले खूब दिखे, कोई 11 , कोई 21 , 51 तो कोई 101 . 
वैसे यज्ञं की सबसे बड़ी खासियत थी प्रेमी युवा जोड़ो के मिलने की एक शुकून भरी जगह. आवारगर्दी करने वालो के लिए 5  दिनों जन्नत नसीन जगह, अपने को रंगदार दिखने की चाहत रखने वालो के लिए लाठी ले कर कार्यकर्त्ता के रूप में यहाँ वहा दौड़ते रहने वालो के लिए खुबसूरत आशियाना, साथ ही धुल में सने समोसे, जलेबी भी खूब बीके. 
मनोरंजन के लिए लगाएगए झूलो का भी यज्ञं प्रेमियों ने खूब आनंद लिया.
यज्ञं के दौरान हवाओ में कई बाते भी होती रही. खासकर राजनेताओ को लेकर अनंत सिंह आये, किसी ने बताया नितीश कुमार आ रहे है तो कोई राजीव रंजन (ललन सिंह) की बात कर रहा है. 
वैसे ये यज्ञं समाज को जोड़ने, प्रेम, स्नेहका प्रचार , आपसी रंजिता को समाप्त करने और एक सफल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समाप्त हुआ.

सफ़र

किसी भी सफ़र में अगर आपका टिकट कन्फ़र्म न हो...तो दिकक्तो के नए दास्ताँ शुरू हो जाते है. उसमे भी 80 दिन पहले लिया हुआ टिकट जब कन्फ़र्म न हो तो दर्द जयादा होता है..टी.टी. महासय की कृपा से 1  सीट तो मिला पर एक अनजान सख्स के साथ शेयर करते हुए...(पहले रात में (बंगलोर से चेन्नई ) टिकट कन्फ़र्म था. पर सुबह की अगली गाड़ी में मेरा नंबर बेटिंग लिस्ट 33  था.) रेलवे की व्यवस्था, दलालों की टिकट में भूमिका और बिहार से इतने लोग बाहर रोजी - रोजगार को क्यों आते है इस मंथन के साथ यात्रा सुरु हुई...
चेन्नई की गर्मी में उमस जयादा है.. ट्रेन की पेंट्री कार में रखे पानी के  बोतल बर्फ की ठंडक को कमजोर कर यात्रियों को अपनी गर्मी का अहसास दिला रहे थे. 4 घंटे चेन्नई रेलवे स्टेशन पे गुजारने और सीट कन्फ़र्म न होने के दर्द के बीच ये गर्म पानी की बोतले दुखदायी यात्रा की कहानी बाया कर रही थी. 
मेरे साथ सीट शेयर करने वाले सज्जन एक स्टील कंपनी में सुपर वइसर के पद पर कार्यरत थे और देवघर के पास में एक गावं में उनका घर था. चेन्नई से चल कर ओंगोल, विजयवाड़ा, राजमुंदरी होते हुए शाम 7  बजे हम विशाखापत्तनम में थे. शाम होने के कारन गर्मी कुछ कम थी. पर विशाखापत्तनम में यात्रियों के हुजूम से दिल डोल गया...यकायक ट्रेन में यात्री की संख्या दुगनी दिखनी शुरू हो गयी. 
लोगो से घुलना - मिलना पसंद है..तो लगभग पूरी रात बात  - चित में गुजर गयी. श्रीकाकुलम, विजयनगरम, पलसा होते हुए, रात के 12  बजे हम उड़ीसा में प्रवेश कर रहे थे. बरहमपुर से गाड़ी छुटने के बाद चांदनी रात में पहली बार चिल्का झील को देख रहा था. 
सोते हुए लोगो के मुह से गिरने वाले लार, खराटे, और पसीने की बदबू के साथ ही एक बच्ची का बार बार रोना इस दुखदायी यात्रा में और भी परेशानी पैदा कर रहा था. सुबह के 3  बजे हम खुर्दा रोड में थे (यही  से जगन्नाथ पुरी जाते  है.)  1 घंटे  बाद हम भुबनेश्वर में थे और फिर सूर्योदय कटक में देख रहा था. अब नींद आ रही थी तो सो गया. नींद खुली  एशिया के सबसे बड़े प्लेटफ़ॉर्म खडगपुर पर सुबह 8 . 48  में. यहाँ का आलू चोप बड़ा मशहूर है.. 
सायद हमारी ट्रेन को भी आलू चोप से मोहबत हो गयी पूरे 2  घंटे खड़ी रही खडगपुर में....अब हमारी गाड़ी 2 .30 घंटे लेट थी.
बंगाल में चुनाव के दो चरण अभी बांकी थे इसका असर रेलवे किनारे बसे गाँवो पर दिख रहा था...लकिन अजीब बात यह थी की जयादा तर घरो में सी पी एम और तृणमूल दोनों के झंडे दिख रहे थे...मिदनापुर से होते हुए हम दोपहर 3  बजे आसनसोल में थे..चुनावी सरगर्मी आसनसोल के प्लेटफ़ॉर्म पर भी दिख रहा था. 
वैसे अब बिहार के नजदीक आ रहे थे तो घर पहुचने की जल्दी दिल में दस्तक दे रही थी. गर्मी की मार और हवा के गर्म थपेड़ो से रु ब रु होते शाम 8  बजे मोकामा की पावन धरती पर था..परसुराम जयंती के कारन पूरा माहौल भक्ति मय था...रिक्सा पर बैठकर घर की और चल दिए.