मोकामा की फिज़ाओ में इस बार लगन (विवाह समारोहों ) की धूम थी. मेरे घर में ही 12 से 26 मई के बीच कुल 12 निमंत्रण मौजूद थे. तीन मौखिक आमन्त्रण भी थे.
विवाह को वैसे तो हिन्दू धार्मिक पद्धति में अति शुभ अवम मांगलिक तरीके से सम्पन्न कराया जाता है. जिसके तहत नव युगल जोड़े के जीवन की खुशियों एवम शुख - शांति की मंगल कामना हम अलग - अलग तरीके से अपने अपने ईस्ट से करते है.
खैर बात मोकामा के विवाह समारोहों की करू तो कुछ चीजे नयी एवम आडम्बर तथा विलासिता की रंग में रंगा पाया. यु तो विवाह समारोहों में साज - सज्जा, खान - पान आदि पे खर्च तो आम चलन है लकिन इसमें अगर विलासिता के रंग घुलने शुरू हो जाये तो ये भटकाव समाज को रसातल में ले जाने को काफी है. इसे पढ़ते हुए जरूरी नहीं आप मेरे विचारो से सहमत हो, लेकिन मेरे आँखों देखे इन कुछ विवाह समारोहों ने मुझे कई चीजो पर सोचने को मजबूर किया है.
मसलन शादी के नाम पर दहेज तो सबसे बड़ा कलंक है ही लेकिन इसके साथ ही जयादा तर परिवारों के द्वारा विवाह को सादगी पूर्ण रूप में सम्पन्न न करा के आडम्बर एवम दिखावे के रूप में सम्पन्न करना कई सामाजिक प्रश्नों को जन्म देता है.
शादी समारोहों में तिलक एवम बारात में जाने के लिए छोटी गाडियों के बढ़ते चलन से जहा एक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है वही प्रदूसन एवम पेट्रोल - डीजल की खपत भी बढती है. कई परिवारों के लिए गाड़ी आदि का कम प्रश्न शान की बात में तब्दील हो जाता है.
शादियों में बजने वाले बाजे (बेंड पार्टियों ) पर भी एक अनावश्यक खर्च के रूप में कई परिवारों को विवाह सम्पन्न होने के बाद भी लम्बे समय तक आर्थिक परेशानी पैदा किये रहता है. (खासकर लड़की पक्ष को) आज कल बेंड पार्टियों के साथ ही आर्केस्ट्रा का चलन भी बढता जा रहा है.
पटाखे भी उसी दिखावे का एक हिस्सा है.
लेकिन सबसे बड़ी चिंता है.......शराब ....जी हा शराब का प्रचलन विवाह समारोहों में इस कदर बढा है की ये हर शादी समारोह में लड़ाई -झगडे से लेकर पुरे शादी समारोह को ही ख़राब कर देता है. हमारे यहाँ के जो भी युवा है उनसे मेरा विनम्र आग्रह है...कृपया शराब से शादी के पवित्र समारोह को ख़राब न करे.
लकिन इन सबके साथ ही भोजपुरी एवम हिंदी फ़िल्मी गीतों में अश्लीलता के रस घोल कर उसे अपने ही समाज और वहा की बहु - बेटियों के समक्ष गंदे एवम असलील तरीके से नाचने का दिखावा आज के समय में हमारे समाज की विचार शुन्यता का परिचायक है.
सामजिक व्यवस्था में हर व्यक्ति एक जैसा हो ये समभ नहीं है. लेकिन मैंने ये बड़े ही पास से महसूस किया है की जयादा तर वो परिवार जो ऐसे आडम्बर पूर्ण आयोजनों के बाद कई वर्षो तक आर्थिक परेसानियो का सामना करते है उन्हें इन विषयों पर खास कर धयान देना चाहिए.
इसके साथ समाज के हरेक परिवार को जागरूक होकर विवाह समारोहों में होने वाले ऐसे दिखावे roopi आयोजन से बचना चाहिए.
खैर मोकामा और अन्य गावो में आज हमारी पौराणिक रीती रिवाज जीवित है...और ये विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्यो में दिख जाते है...सामाजिक सहयोग, महिलाओ के द्वारा लोक गीतों की प्रस्तुति (नचारी, कोहबर, पीहर, देवता के गीत, मजाक में गालियों का चलन आदि) आदि विवाह समारोहों को खुशियों के रंगों में भी रंगता है..
इन शादी समारोहों में जम कर रसगुल्ले खाया. वैसे एक बारात में रात में 2 बाजे खाना नसीब हुआ.लगभग हर शादी समारोह में "पल पल न माने ये टिंकू जिया" गाने की धूम रही.
पर सब मिला कर शादियों के मौसम में मोकामा में थोड़े दिन बिताना बड़ा ही आनंददायी रहा.