क्रिकेट के लिए दीवाने देश में अगर ४ सीआरपीएफ जवान मर जाये या फिर कोई किसान विधान सभा के सामने जहर पीकर आत्महत्या करले और फिर भी खबर सुर्खी न पाये तो इससे बड़ी त्रासदी इस देश के लिए कुछ और नहीं होगी। आज छतीसगढ़ में जहाँ चार जवान एक बार फिर नक्सलवादी हमले के शिकार बने वहीं कर्नाटक के बेलगाम में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान गन्ना के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 2500 रूपये टन से बढाकर 3000 रुपये टन किये जाने को लेकर प्रदर्शन कर रहे एक किसान ने जहर पीकर आत्महत्या कर ली लेकिन इन ख़बरों में कोई मसाला नहीं है इसलिए सरकार से साथ साथ मीडिया भी आँखें मूंदे है।
देश में उद्योग और कार्पोरेट के लिए अगर रेड कार्पेट बिछाना हो तो उसका रास्ता किसान कि जमीन पर से हो कर गुजरता है और अगर वोट पाना हो तो उसके लिए किसान का अनाज रूपये दो रूपये किलो में बाँटने के लिए सरकार तैयार है लेकिन अगर बात उसी किसान जरूरतों को पूरा करने का हो तो सरकार के लिए यह वोट बैंक नहीं बन पता। कर्नाटक में जिंदगी से बेहतर मौत को गले लगाने वाले किसान ने इस वर्ष पट्टे पर 9 एकड़ जमीन लेकर गन्ने कि खेती कि थी लेकिन पूरी फसल बर्बाद हो गयी। ऊपर से गन्ना का समर्थन मूल्य भी मात्र 2500 रूपये है और चीनी मिल मालिक उससे उलट मात्र 2000 रूपये प्रति टन गन्ना खरीद रहे है। ऐसे हजारों किसान हैं जिन्होंने गन्ने कि खेती के लिए बैंक या साहूकार से कर्ज ले रखा है। पैसा नहीं देंगे तो भी मौत है और दे देते हैं तो पूरे साल परिवार का क्या होगा इसकी चिंता। दुर्भाग्य है कि इन किसानों तक केंद्र और राज्य कि कोई भी योजना उन्हें दो वक्त कि रोटी देने में असमर्थ है। किसानों कि दयनीय स्थिति और दोहन के लिए न तो कोई दल और न ही मानवाधिकार या सिविल सोसायटी आवाज उठाने के लिए आगे आएगी। ऐसे किसानों के समर्थन में हमने कहीं भी केंडल लेकर प्रदर्शन करने वाली भीड़ नहीं देखी है।
किसान नामक इस शब्द के साथ में राज्य का कोई नाम हो कर्नाटक /महाराष्ट्र /तमिलनाडु /मध्य प्रदेश या फिर बिहार /बंगाल … किसान कि स्थिति हर प्रान्त में एक जैसी ही है।
इस बिहार गए तो लखीसराय के पास एक गांव में स्थित एक मंदिर गए। मंदिर के बाहर कोई 100 छोटी बड़ी दुकानें थी। एक दुकान में पूजा कि सामग्री और प्रसाद खरीदने पहुचें तो दुकान वाले ने कुल जमा 32 रूपये माँगा। मैंने उसे दस रूपये के तीन नोट पकड़ा दिए … बाबूजी 2 रुपया और दीजिये .... मैंने उससे कहा 2 रुपया खुदरा नहीं है … दुकानकार - अरे खुदरा नहीं है तो ये पैसा लीजिये और जाइये दूसरा दुकान देखिये … उसके गुस्से को देखकर दो कदम पीछे हुए और कहा .... अरे भाई एतना गुस्सा होइएगा तो कैसे दुकानदारी कीजियेगा …
तो आपको क्या लग रहा है ई दुकान से हम ताजमहल बना लेंगे .... जैसे दू दिन से बोहनी नहीं हुआ एक और दिन सही क्या हो जायेगा जो आप परसादी नहीं लीजियेगा … दुकानदार के भीतर छुपे आक्रोश को जानने के लिए इस बार उसकी दुकान कि बेंच पर हम बैठ गए … आप इतना गुस्सा में काहे बात कर रहे हैं क्या हुआ बताइये तो सही ....
दुकानदार : नौकरी करते हैं न बौआ आप
जी
ई है कारन है किसान मजदूर के दर्द को आप नहीं जानते हैं। नौ बीघा में गहूंम लगाये थे। बाजार का बीया था पूरा फसल बाली आवे तक बढ़िया दिखा अ गहुम हुआ 100 मन .... kCC के रखे से बैंक का डर अलग .... बेटा के दिल्ली में BCA में नाम लिखाये थे ओकरो अबरी साल फ़ीस नै भराया त ऐजे बइठल है .... तीन गो जुआन बेटी बियाहे ले है …… आ आप कहते हैं कि दू रुपया में कि हो जायेगा … ई दोकान जे देख रहे हैं एजो खली सोमार के भीड़ रहता है .... इ से लाख दू लाख नय कमाते हैं हम … बस दिन कट्टन है …
उनकी बातों का कोई जबाब नहीं था मेरे पास क्युकी किसान परिवार में पैदा होने के कारण बड़े ही करीब से किसानों के दर्द से वाकिफ हूँ … थोड़ी देर कुछ और भी बातें हुयी .... बेंच पर से उठे तो दुकानकार का गुस्सा मेरे लिए कम हो गया था .... स्नेह भरी आवाज में बोला जाइये बौआ जी पूजा करके आ जाइये EMU आने का समय हो गया है फेरो भीड़ बढ़ जायेगा .... जेब से निकालकर पांच का सिक्का बढ़ाया तो बोले रख लीजिये इसे अब आप से नहीं लेंगे ....
सरकार नीतियॉ चाहे उद्योग के लिए बने या बिल्ड़र के लिए अस्पताल बने या अजायबघर हर जगह जमीन चाहिए किसान कि .... और अगर वोट चाहिए तो वहाँ भी किसान का अनाज लकिन किसान को क्या चाहिए यह प्रश्न हर राज्य और केंद्र सरकार के अनुत्तरित है
देश में उद्योग और कार्पोरेट के लिए अगर रेड कार्पेट बिछाना हो तो उसका रास्ता किसान कि जमीन पर से हो कर गुजरता है और अगर वोट पाना हो तो उसके लिए किसान का अनाज रूपये दो रूपये किलो में बाँटने के लिए सरकार तैयार है लेकिन अगर बात उसी किसान जरूरतों को पूरा करने का हो तो सरकार के लिए यह वोट बैंक नहीं बन पता। कर्नाटक में जिंदगी से बेहतर मौत को गले लगाने वाले किसान ने इस वर्ष पट्टे पर 9 एकड़ जमीन लेकर गन्ने कि खेती कि थी लेकिन पूरी फसल बर्बाद हो गयी। ऊपर से गन्ना का समर्थन मूल्य भी मात्र 2500 रूपये है और चीनी मिल मालिक उससे उलट मात्र 2000 रूपये प्रति टन गन्ना खरीद रहे है। ऐसे हजारों किसान हैं जिन्होंने गन्ने कि खेती के लिए बैंक या साहूकार से कर्ज ले रखा है। पैसा नहीं देंगे तो भी मौत है और दे देते हैं तो पूरे साल परिवार का क्या होगा इसकी चिंता। दुर्भाग्य है कि इन किसानों तक केंद्र और राज्य कि कोई भी योजना उन्हें दो वक्त कि रोटी देने में असमर्थ है। किसानों कि दयनीय स्थिति और दोहन के लिए न तो कोई दल और न ही मानवाधिकार या सिविल सोसायटी आवाज उठाने के लिए आगे आएगी। ऐसे किसानों के समर्थन में हमने कहीं भी केंडल लेकर प्रदर्शन करने वाली भीड़ नहीं देखी है।
किसान नामक इस शब्द के साथ में राज्य का कोई नाम हो कर्नाटक /महाराष्ट्र /तमिलनाडु /मध्य प्रदेश या फिर बिहार /बंगाल … किसान कि स्थिति हर प्रान्त में एक जैसी ही है।
इस बिहार गए तो लखीसराय के पास एक गांव में स्थित एक मंदिर गए। मंदिर के बाहर कोई 100 छोटी बड़ी दुकानें थी। एक दुकान में पूजा कि सामग्री और प्रसाद खरीदने पहुचें तो दुकान वाले ने कुल जमा 32 रूपये माँगा। मैंने उसे दस रूपये के तीन नोट पकड़ा दिए … बाबूजी 2 रुपया और दीजिये .... मैंने उससे कहा 2 रुपया खुदरा नहीं है … दुकानकार - अरे खुदरा नहीं है तो ये पैसा लीजिये और जाइये दूसरा दुकान देखिये … उसके गुस्से को देखकर दो कदम पीछे हुए और कहा .... अरे भाई एतना गुस्सा होइएगा तो कैसे दुकानदारी कीजियेगा …
तो आपको क्या लग रहा है ई दुकान से हम ताजमहल बना लेंगे .... जैसे दू दिन से बोहनी नहीं हुआ एक और दिन सही क्या हो जायेगा जो आप परसादी नहीं लीजियेगा … दुकानदार के भीतर छुपे आक्रोश को जानने के लिए इस बार उसकी दुकान कि बेंच पर हम बैठ गए … आप इतना गुस्सा में काहे बात कर रहे हैं क्या हुआ बताइये तो सही ....
दुकानदार : नौकरी करते हैं न बौआ आप
जी
ई है कारन है किसान मजदूर के दर्द को आप नहीं जानते हैं। नौ बीघा में गहूंम लगाये थे। बाजार का बीया था पूरा फसल बाली आवे तक बढ़िया दिखा अ गहुम हुआ 100 मन .... kCC के रखे से बैंक का डर अलग .... बेटा के दिल्ली में BCA में नाम लिखाये थे ओकरो अबरी साल फ़ीस नै भराया त ऐजे बइठल है .... तीन गो जुआन बेटी बियाहे ले है …… आ आप कहते हैं कि दू रुपया में कि हो जायेगा … ई दोकान जे देख रहे हैं एजो खली सोमार के भीड़ रहता है .... इ से लाख दू लाख नय कमाते हैं हम … बस दिन कट्टन है …
उनकी बातों का कोई जबाब नहीं था मेरे पास क्युकी किसान परिवार में पैदा होने के कारण बड़े ही करीब से किसानों के दर्द से वाकिफ हूँ … थोड़ी देर कुछ और भी बातें हुयी .... बेंच पर से उठे तो दुकानकार का गुस्सा मेरे लिए कम हो गया था .... स्नेह भरी आवाज में बोला जाइये बौआ जी पूजा करके आ जाइये EMU आने का समय हो गया है फेरो भीड़ बढ़ जायेगा .... जेब से निकालकर पांच का सिक्का बढ़ाया तो बोले रख लीजिये इसे अब आप से नहीं लेंगे ....
सरकार नीतियॉ चाहे उद्योग के लिए बने या बिल्ड़र के लिए अस्पताल बने या अजायबघर हर जगह जमीन चाहिए किसान कि .... और अगर वोट चाहिए तो वहाँ भी किसान का अनाज लकिन किसान को क्या चाहिए यह प्रश्न हर राज्य और केंद्र सरकार के अनुत्तरित है
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