उम्मीद, ....आसमान की परिधि से परे...ठीक वैसा ही जैसे आसमान को किसी सीमा में नहीं बांध सकते .... इस उम्मीद के दायरे को किसी सीमा में रख ही नहीं सकते....लेकिन फिर भी जैसे आसमान की उचाइयो को छूने की तम्मना हमारे दिलो में होती है..वैसा ही कुछ उम्मीदों के आसमान तक पहुचने की भी.....तो जब तक हमारे दायरे इसी प्रकार रहेंगे... ये 'उम्मीदों का आसमान भी ऐसा होगा.....आखिर हासिल जो करना है....उम्मीदों के आसमान.... को
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
उम्मीदों का आसमान: आज उससे तू दूर खड़ा
उम्मीदों का आसमान: आज उससे तू दूर खड़ा: "बड़ी प्यारी सी गजल थी तुम, सपना नहीं एक हकीकत थी तुम. गम तो कभी पाया ही नहीं तेरे से , फिर क्यों सब जुदा हो गए तेरे से. ... दामन में ..."
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