शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कर्तव्य

गिरता रहा, फिर भी कदम बढ़ते रहे उस बर्फ पे,
बार बार फिसला था लेकिन, दृर्ता मेरी फिसली नहीं.
पाव डग-मग डोलते थे, पर चित मेरा स्थिर था खड़ा

सोचता हू जो न उठता, कैसे मिलती मेरी मंजिल मुझे.

एक चाह बस मन में छुपा था चलना तेरा कर्तव्य है,
पथ सामने जो दिख रहा है वही तेरा उचित मार्ग है
कुछ डर भी था छिपा और कुछ हरबराहट
पर चलता रहा चलता रहा 

 




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