किसी भी सफ़र में अगर आपका टिकट कन्फ़र्म न हो...तो दिकक्तो के नए दास्ताँ शुरू हो जाते है. उसमे भी 80 दिन पहले लिया हुआ टिकट जब कन्फ़र्म न हो तो दर्द जयादा होता है..टी.टी. महासय की कृपा से 1 सीट तो मिला पर एक अनजान सख्स के साथ शेयर करते हुए...(पहले रात में (बंगलोर से चेन्नई ) टिकट कन्फ़र्म था. पर सुबह की अगली गाड़ी में मेरा नंबर बेटिंग लिस्ट 33 था.) रेलवे की व्यवस्था, दलालों की टिकट में भूमिका और बिहार से इतने लोग बाहर रोजी - रोजगार को क्यों आते है इस मंथन के साथ यात्रा सुरु हुई...
चेन्नई की गर्मी में उमस जयादा है.. ट्रेन की पेंट्री कार में रखे पानी के बोतल बर्फ की ठंडक को कमजोर कर यात्रियों को अपनी गर्मी का अहसास दिला रहे थे. 4 घंटे चेन्नई रेलवे स्टेशन पे गुजारने और सीट कन्फ़र्म न होने के दर्द के बीच ये गर्म पानी की बोतले दुखदायी यात्रा की कहानी बाया कर रही थी.
मेरे साथ सीट शेयर करने वाले सज्जन एक स्टील कंपनी में सुपर वइसर के पद पर कार्यरत थे और देवघर के पास में एक गावं में उनका घर था. चेन्नई से चल कर ओंगोल, विजयवाड़ा, राजमुंदरी होते हुए शाम 7 बजे हम विशाखापत्तनम में थे. शाम होने के कारन गर्मी कुछ कम थी. पर विशाखापत्तनम में यात्रियों के हुजूम से दिल डोल गया...यकायक ट्रेन में यात्री की संख्या दुगनी दिखनी शुरू हो गयी.
लोगो से घुलना - मिलना पसंद है..तो लगभग पूरी रात बात - चित में गुजर गयी. श्रीकाकुलम, विजयनगरम, पलसा होते हुए, रात के 12 बजे हम उड़ीसा में प्रवेश कर रहे थे. बरहमपुर से गाड़ी छुटने के बाद चांदनी रात में पहली बार चिल्का झील को देख रहा था.
सोते हुए लोगो के मुह से गिरने वाले लार, खराटे, और पसीने की बदबू के साथ ही एक बच्ची का बार बार रोना इस दुखदायी यात्रा में और भी परेशानी पैदा कर रहा था. सुबह के 3 बजे हम खुर्दा रोड में थे (यही से जगन्नाथ पुरी जाते है.) 1 घंटे बाद हम भुबनेश्वर में थे और फिर सूर्योदय कटक में देख रहा था. अब नींद आ रही थी तो सो गया. नींद खुली एशिया के सबसे बड़े प्लेटफ़ॉर्म खडगपुर पर सुबह 8 . 48 में. यहाँ का आलू चोप बड़ा मशहूर है..
सायद हमारी ट्रेन को भी आलू चोप से मोहबत हो गयी पूरे 2 घंटे खड़ी रही खडगपुर में....अब हमारी गाड़ी 2 .30 घंटे लेट थी.
बंगाल में चुनाव के दो चरण अभी बांकी थे इसका असर रेलवे किनारे बसे गाँवो पर दिख रहा था...लकिन अजीब बात यह थी की जयादा तर घरो में सी पी एम और तृणमूल दोनों के झंडे दिख रहे थे...मिदनापुर से होते हुए हम दोपहर 3 बजे आसनसोल में थे..चुनावी सरगर्मी आसनसोल के प्लेटफ़ॉर्म पर भी दिख रहा था.
वैसे अब बिहार के नजदीक आ रहे थे तो घर पहुचने की जल्दी दिल में दस्तक दे रही थी. गर्मी की मार और हवा के गर्म थपेड़ो से रु ब रु होते शाम 8 बजे मोकामा की पावन धरती पर था..परसुराम जयंती के कारन पूरा माहौल भक्ति मय था...रिक्सा पर बैठकर घर की और चल दिए.
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