उम्मीद, ....आसमान की परिधि से परे...ठीक वैसा ही जैसे आसमान को किसी सीमा में नहीं बांध सकते .... इस उम्मीद के दायरे को किसी सीमा में रख ही नहीं सकते....लेकिन फिर भी जैसे आसमान की उचाइयो को छूने की तम्मना हमारे दिलो में होती है..वैसा ही कुछ उम्मीदों के आसमान तक पहुचने की भी.....तो जब तक हमारे दायरे इसी प्रकार रहेंगे... ये 'उम्मीदों का आसमान भी ऐसा होगा.....आखिर हासिल जो करना है....उम्मीदों के आसमान.... को
रविवार, 9 जनवरी 2011
तू बढ़ 'प्रिय'
मुस्कान हो या मेरी खुशिंया
सब को कर लो कैद तुम,
बांध दो बेरियो में इनको
अब हवा पे भी पहरे बिठा दो.
फिर भी मेरी चाह मुझको
सच का दामन थामने को,
हर बार एक आवाज देगी
तू कर्म पथ पर बढ़ 'प्रिय'
तू बढ़ 'प्रिय', तू बढ़ 'प्रिय'
फिर भी मेरी चाह मुझको सच का दामन थामने को, हर बार एक आवाज देगी तू कर्म पथ पर बढ़ 'प्रिय' Bahut sunder panktiyan.....Ek sandesh hai inme har deshwasi ke liye........ Badiya rachna...
शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणी करने में आसानी होगी ..धन्यवाद वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया
फिर भी मेरी चाह मुझको
जवाब देंहटाएंसच का दामन थामने को,
हर बार एक आवाज देगी
तू कर्म पथ पर बढ़ 'प्रिय'
Bahut sunder panktiyan.....Ek sandesh hai inme har deshwasi ke liye........ Badiya rachna...
सच का दामन ...से ही वैतरणी पार करना शाम्भव है
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना !
जवाब देंहटाएंगणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई !
शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणी करने में आसानी होगी ..धन्यवाद
जवाब देंहटाएंवर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया
बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति धन्यवाद|
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