रविवार, 9 जनवरी 2011

तू बढ़ 'प्रिय'

मुस्कान हो या मेरी खुशिंया
सब को कर लो कैद तुम,
बांध दो बेरियो में इनको
अब हवा पे भी पहरे बिठा दो.

फिर भी मेरी चाह मुझको
सच का दामन थामने को,
हर बार एक आवाज देगी
तू कर्म पथ पर बढ़ 'प्रिय'
तू बढ़ 'प्रिय', तू बढ़ 'प्रिय'

5 टिप्‍पणियां:

  1. फिर भी मेरी चाह मुझको
    सच का दामन थामने को,
    हर बार एक आवाज देगी
    तू कर्म पथ पर बढ़ 'प्रिय'
    Bahut sunder panktiyan.....Ek sandesh hai inme har deshwasi ke liye........ Badiya rachna...

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  2. सच का दामन ...से ही वैतरणी पार करना शाम्भव है

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  3. सुन्दर रचना !

    गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई !

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  4. शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणी करने में आसानी होगी ..धन्यवाद
    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया

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  5. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति धन्यवाद|

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